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कॉर्बेट के बदलते पर्यटन की कहानी,पर्यटन बढ़ा, तस्वीर बदली… कॉर्बेट में सफारी से वेडिंग डेस्टिनेशन तक पहुंचा सफर

विश्व-पर्यटन दिवस पर बात उस उत्तराखंड की, जिसे पहाड़, नदियां, झीलें, धार्मिक धरोहर और वन्यजीव पर्यटन देश-दुनिया के नक्शे पर खास पहचान देते हैं,नैनीताल से कॉर्बेट तक हर साल लाखों पर्यटक पहुंचते हैं, कोई नैनीताल की झीलों और पहाड़ों का दीदार करने आता है, तो कोई कॉर्बेट के जंगल में बाघ की एक झलक पाने की उम्मीद लेकर पहुंचता है.कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की पहचान देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के प्रमुख वन्यजीव पर्यटन स्थलों में होती है, यहां जंगल सफारी हजारों लोगों की आजीविका का आधार है. लेकिन पर्यटन बढ़ने के साथ एक नई बहस भी तेज हुई है—क्या सिर्फ पर्यटकों की संख्या बढ़ना ही पर्यटन की सफलता है? या फिर ऐसा पर्यटन जरूरी है, जिसमें स्थानीय रोजगार के साथ जंगल, वन्यजीव, नदियां और स्थानीय संस्कृति भी सुरक्षित रहे?कॉर्बेट में पर्यटन का दायरा पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है,होटल, रिजॉर्ट, जिप्सी, नेचर गाइड, ड्राइवर, स्थानीय दुकानदार और दूसरे छोटे-बड़े कारोबार सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़े हैं.लेकिन इसी बढ़ते पर्यटन के बीच इको टूरिज्म के मूल उद्देश्य को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं.वरिष्ठ वन्यजीव प्रेमी और विशेषज्ञ इमरान खान कहते हैं कि पर्यटन का वास्तविक अर्थ सिर्फ मनोरंजन नहीं है, पर्यटन का संबंध किसी क्षेत्र की संस्कृति, मूल्यों, ज्ञान और स्थानीय जीवन से भी होना चाहिए,उनके मुताबिक पर्यटन से स्थानीय लोगों को रोजगार मिले, लेकिन जिस क्षेत्र में पर्यटक पहुंच रहे हैं, वहां के संरक्षण और शांति का भी ध्यान रखा जाना चाहिए वन्यजीव विशेषज्ञ सुमंता घोष एक अलग नजरिए से देखते हैं,उनके मुताबिक उत्तराखंड में यात्रा की परंपरा हमेशा सिर्फ घूमने-फिरने तक सीमित नहीं रही, यात्रा व्यक्ति को अनुभव, सीख और बदलाव देकर लौटाती थी,अब सवाल यह है कि उत्तराखंड के संवेदनशील और नाजुक लैंडस्केप में आने वाला पर्यटक यहां से क्या सीखकर जा रहा है और क्षेत्र को क्या देकर जा रहा है?सुमंता घोष कहते है केवल आना, खाना-पीना, मनोरंजन करना, शोर मचाना और गंदगी फैलाकर चले जाना पर्यटन नहीं हो सकता,पर्यटन की नीतियां ऐसी हों, जिससे स्थानीय लोगों की आजीविका भी लंबे समय तक सुरक्षित रहे और पर्यावरण का संरक्षण भी हो.पर्यटन का दबाव जंगल और आसपास के पर्यावरण पर कितना पड़ रहा है.नैनीताल की झील, पहाड़ और प्राकृतिक सुंदरता लंबे समय से पर्यटकों को आकर्षित करती रही है. विश्व पर्यटन दिवस पर पर्यटन को सिर्फ पर्यटकों की संख्या से मापने के बजाय उसके प्रभाव को भी देखने की जरूरत महसूस की जा रही है.प्रसिद्ध वन्यजीव फोटोग्राफर दीप रजवार के मुताबिक कॉर्बेट सिर्फ पर्यटकों के घूमने की जगह नहीं है, यह वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों का साझा जीवन है, दीप रजवार कहते है कॉर्बेट लाखों लोगों की आजीविका का केंद्र है, लेकिन यह वन्यजीवों का भी घर है, हमें ऐसा पर्यटन चाहिए जो स्थानीय समुदाय, संस्कृति और वन्यजीवों का सम्मान करे,अनियंत्रित पर्यटन से कॉरिडोर प्रभावित हुए हैं, इसलिए सरकार को ठोस नीति बनानी होगी कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व के पार्क वार्डन बिंदर पाल सिंह के मुताबिक पिछले छह वर्षों में करीब 18 से 20 लाख भारतीय और 25 से 30 हजार विदेशी पर्यटक कॉर्बेट पहुंचे हैं, ऐसे में पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना विभाग की प्राथमिकता है.एक तरफ पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है,हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है,दूसरी तरफ बढ़ता दबाव जंगल, वन्यजीव, यातायात, कचरा और प्राकृतिक संसाधनों के सामने नई चुनौतियां खड़ी करता है।विश्व पर्यटन दिवस पर कॉर्बेट और नैनीताल की कहानी इसलिए सिर्फ बढ़ते पर्यटकों की कहानी नहीं है। यह उस सवाल की कहानी भी है कि आने वाले वर्षों में उत्तराखंड किस तरह का पर्यटन चाहता है.ऐसा पर्यटन, जिसमें पर्यटक आएं, स्थानीय लोगों की आय बढ़े, कारोबार चले और रोजगार पैदा हों—लेकिन साथ ही जंगल की शांति, वन्यजीवों का प्राकृतिक व्यवहार, नदियों की स्वच्छता और स्थानीय संस्कृति भी सुरक्षित रहे।कॉर्बेट और नैनीताल में पर्यटन की रफ्तार लगातार बढ़ रही है, लेकिन अब चुनौती सिर्फ पर्यटकों को आकर्षित करने की नहीं, बल्कि पर्यटन और संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की है। क्योंकि कॉर्बेट की असली ताकत उसके जंगल और वन्यजीव है