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महासू देवता मंदिरों में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब…

उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति और लोक आस्था के अनूठे केंद्र महासू महाराज मंदिरों में प्रसिद्ध ‘जागड़ा’ पर्व की धूम है। इस विशेष पर्व पर देवता के जयकारों से पूरी वादी गूंज उठी है और जौनसार बावर में स्थित मुख्य पीठ हनोल ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के तमाम अन्य महासू मंदिरों में भी देश-विदेश और दूर-दराज से पहुंचे हजारों श्रद्धालु अपने आराध्य के दर्शन कर आशीर्वाद ले रहे हैं।जौनसार-बावर में जागड़ा पर्व किसी एक स्थान का नहीं, बल्कि संपूर्ण क्षेत्र की आस्था का महाकुंभ है। हर साल भाद्रपद मास के अंत में मनाए जाने वाले इस दो दिवसीय अनुष्ठान के दौरान हनोल स्थित महासू देवता के मुख्य मंदिर के साथ-साथ थैना, लख्सयार, लखवाड़, बिसोई और भंवरा सहित जौनसार-बावर के तमाम महासू देवता मंदिरों व हिमाचल सीमा से लगे अन्य प्रमुख महासू मंदिरों में भी गजब का भारी देखने को मिल रहा है। हर मंदिर परिसर पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप, रासू और तांदी नृत्यों तथा देव-जयकारों से पूरी तरह देवमय हो चुका है। दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें अपने आराध्य के प्रति अटूट आस्था की गवाही दे रही हैं। जहां देव चिह्नहों को विधि विधान के साथ स्नान कराकर पूजा अर्चना की जा रही है।इस आयोजन की मान्यता महासू देवता और किरमिर राक्षस के बीच की पौराणिक कथा से जुड़ी है, मान्यता है कि प्राचीन काल में इस क्षेत्र में ‘किरमिर’ नामक एक अत्याचारी राक्षस का आतंक था। उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर ऋषि-मुनियों और स्थानीय जनता ने हूण देश (वर्तमान जौनसार क्षेत्र) के राजा से सहायता मांगी। इसके बाद न्याय के देवता महासू महाराज चार भाइयों बाशिक, पवासी, चालदा और बिसरू के रूप में प्रकट हुए, जिन्होंने इस क्षेत्र में प्रवेश किया। महासू देवता और किरमिर राक्षस के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें देवता ने इस दुष्ट असुर का वध कर प्रजा को उसके आतंक से मुक्त कराया

इसी ऐतिहासिक और पौराणिक विजय के उपलक्ष्य में यह ‘जागड़ा’ पर्व मनाया जाता है। जागड़ा का शाब्दिक अर्थ ‘जागना’ या ‘रात्रि जागरण’ है, जिसमें विभिन्न मंदिरों में देवता के पश्वा और श्रद्धालु रातभर जागकर भजन-कीर्तन और स्तुति करते हैं, साथ ही दूसरे दिन देव चिह्नहों व डोलियो को स्नान कराकर मंदिरों में स्थापित कर पूजा अर्चना की जाती है। वहीं श्रद्धालु मंदिर परिसर में विभिन्न लोक नृत्य कर भण्डारे का प्रसाद ग्रहण करते हैं।हनोल सहित तमाम मंदिरों में आयोजित हो रहा जागड़ा पर्व जौनसार-बावर की प्राचीन लोक-संस्कृति, आपसी भाईचारे और बुराई पर अच्छाई की जीत का जीवंत प्रतीक है। आधुनिकता की दौड़ के बीच आज भी यहां के लोगों ने अपनी इस गौरवशाली विरासत को पूरी निष्ठा के साथ संजोकर रखा है।